हवा कुनमुना रही पत्तों पर
चिडियों ने
चोंच में दबा रखी आवाज
बादलों में सीझ गईं पानी की बूदें
और
पृथ्वी धीरे –धीरे
बदल रही है अपने घाव का रंग
सबने
धीरे –धीरे छोड़ दीं
उम्मीदें
अब हमें देना होगा
अपने आदमी होने का सबूत
फिर से .....
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