Sunday, 11 November 2012

यात्रा



गाँव की यात्रा पर निकले हैं  लोग   

कोई निकला है

तौलने स्मृतियों को

जाँचने स्मृतियों में

सच का हिस्सा


जुगुल किशोर निकले हैं

शहर में पैदा हुई ऊब को

फटकारने

गाँव –घर की मुंडेर पर

टांगकर लौटने .


बेचन

अपनी फीकी पड़ गई जीभ का

स्वाद बदलने

जा रहे हैं गाँव

 और  दादू


शहर में उनके  घर के आस –पास

इमारतें ऊँची होती गईं   बेतहासा

और दादू 

छोटे होते गए-  -दिनोंदिन

इन सबको 
उनके डूबते हुए रुतबे को             गाँव के तिनके की जरूरत पड़ गई   शायद .

No comments:

Post a Comment