गाँव की यात्रा पर निकले हैं लोग
कोई निकला है
तौलने स्मृतियों को
जाँचने स्मृतियों में
सच का हिस्सा
जुगुल किशोर निकले हैं
शहर में पैदा हुई ऊब को
फटकारने
गाँव –घर की मुंडेर पर
टांगकर लौटने .
बेचन
अपनी फीकी पड़ गई जीभ का
स्वाद बदलने
जा रहे हैं गाँव
और दादू
शहर में उनके
घर के आस –पास
इमारतें ऊँची होती गईं बेतहासा
और दादू
छोटे होते गए- -दिनोंदिन
इन सबको
उनके डूबते हुए रुतबे को गाँव के तिनके की जरूरत पड़ गई शायद .
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