गुजरता हूँ ....
jis dharti par
उसी के विस्तार
उसी धरती के किसी टुकड़े पर
गूंथती हो हंथेलियो से आटे की लोई
पति और बच्चों के साथ
कितनी भाती होगी पृथ्वी
उसका रंग
जिस रात्रि -अँधेरे
आँखे चूम छा रही है नींद
भारी हो रही पलकों पर
उतरना ही चाहते हैं स्वप्न
उसी रात्रि- प्रसंग में
तुम सोईं होंगी
बड़ी -बड़ी पंखुड़ियाँ ढाँप
स्वप्न तुम तक भी पहुचे होंगे
एक ही समय में
एक ही दुनिया में
प्रेम में होने के लिए
कम तो नहीं ?
वह जो सूरज है
साझे आसमान में उगा हुआ
दृगों को जोड़ता उसका त्रिकोण /या जो भी
डूबेगा साथ ही
संकटों के साझे दौर से गुजरते हुए
एक सी मुश्किलों का सामना करते हुए
एक -दुसरे से /को
प्रेम के सिवा ....कुछ भी तो नहीं
अपने -अपने तरीके से लड़ने के
दूर होकर /साथ रहने के
परस्पर ...
हवा और -पानी को यद् करते हुए
कोई कैसे कर सकता है
एक -ही दुनिया में रहते हुए
घृणा का विस्तार
चुटकी में पकड़ी हुई
तुम्हारी सुन्दर छोटी नाक
बरौनियों तक चढ़ी आँखें
गुलगुले गाल
गुस्से से कुप्पा मुंह
कोई कैसे भूल सकता है भला .
अमित एस . परिहार